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टीईटी की परीक्षा से प्रदेश के लाखों शिक्षकों की सेवा पर संकट

टीईटी की परीक्षा से प्रदेश के लाखों शिक्षकों की सेवा पर संकट -जनक सिंह रावत  सरकार से मांग परीक्षा से दी जाए छूट 

टीईटी की परीक्षा से प्रदेश के लाखों शिक्षकों की सेवा पर संकट -जनक सिंह रावत

 

सरकार से मांग परीक्षा से दी जाए छूट

 

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शिवपुरी / माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले से प्रदेश सहित देशभर में लाखों शिक्षकों की सेवा और आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को भी शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया है। इस आदेश से लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों की सेवा असुरक्षित हो गई है।ऑल इंडिया एन पी एस एम्पलाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय मिडिया प्रभारी जनक सिंह रावत

ने प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय डॉ मोहन यादव से इस फैसले पर संवेदनापूर्वक मानवीय आधार पर विचार करने तथा परीक्षा से छूट देने का निवेदन किया है । रावत ने कहा कि 30 से 35 वर्ष की सेवा देने के बाद अब कक्षा आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता थोपना अनुचित है। यह प्रदेश के लाखों शिक्षकों के भविष्य और उनके परिवारों की आजीविका पर सीधा आघात करेगा परंतु इसकी जानकारी आठ वर्षों तक शिक्षकों को नहीं दी गई। प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और एक सितम्बर 2025 को आए फैसले में अदालत ने एनसीटीई की 2017 की अधिसूचना को आधार बनाते हुए यह आदेश दिया। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम का समय है, उन्हें छूट प्रदान की गई है विशेषज्ञों का मानना है कि आरटीई अधिनियम 2009 और 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना के अनुसार, 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को योग्य माना गया था और उन्हें टीईटी से छूट दी गई थी। न्यायालय का ताजा निर्णय इस स्पष्ट भेद को नजरअंदाज करता है, जिससे वर्षों से शिक्षा व्यवस्था का दायित्व निभा रहे अनुभवी शिक्षकों का भविष्य अस्थिर हो गया है।माननीय मुख्यमंत्री से कर्मचारी अपेक्षा रखता है मुख्यमंत्री जी कर्मचारियों को परीक्षा की अनिवार्यता को समाप्त करेंगे

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